भारतीय ज्योतिष् संस्थानम् ट्रस्ट


रजि०  न० ६२९८

योग शब्द का अर्थ होता है जोड़ना अर्थात आत्मा को परमात्मा से जोड़ना

" योगश्चित्त  वृत्ति निरोधः "चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है | इस अवस्था में जीव अपने स्वरुप को पहचानता है, अपने शरीर की उर्जा को पहचानता है| चित्त की वृत्तियों के निरोध के बाद कैवल्य \मोक्ष की प्राप्ति होती है| चित्त की वृत्तियां पांच है – (१) प्रमाण (२) विपर्यय (३) विकल्प  (४) निद्रा (५) स्मृति |

प्रमाण = प्रत्यक्ष , अनुमान , आगम (शब्द)

विपर्यय = मिथ्या ज्ञान एवं संशयः (अविद्या)

विकल्प = शब्द ज्ञानानुपाती वस्तु शून्यो विकल्प : |

निद्रा =  अभाव प्रत्ययालम्बना वृत्तिनिद्रा | निद्रा में तमोगुण प्रधान रहता है | इस अवस्था को सुषुप्ति कहते है |विषय का आभाव इसका आलम्बन है |

स्मृति = "अनुभूत विषया सम्प्रमोषः स्मृतिः |" पहले से प्राप्त ज्ञान की पुनरावृत्ति स्मृति कहलाती है | चित्त की अवस्था भी पांच होती है | क्षिप्त , मूढ़ , विक्षिप्त , एकाग्र , निरुद्ध |

क्षिप्त = इसमे चित्त रजोगुण और तमोगुण के प्रभाव में रहता है | चित्त स्थिरता नहीं रहती है |

मूढ़ =  इस अवस्था में तमोगुण प्रधान रहता है इसमे निद्रा आलस्य आदि उत्पन्न होता है |

विक्षिप्त =इस अवस्था में मन थोड़ी देर के लिए एक विषय में लगता है | तुरंत ही अन्य विषय की ओर ध्यान चला जाता है | यह चित्त की आंशिक स्थिरता अवस्था है |

एकाग्र = इस अवस्था में चित्त देर तक एक विषय में लगा रहता है यह योग का प्रथम चरण है

निरुद्ध = योग की यह अंतिम अवस्था है | इसमे चित्त की सभी वृत्तियों का लोप हो जाता है |

पांच क्लिष्ट वृत्तिया - 

१ - अविद्या = अनित्य को नित्य समझना| मिथ्या सुख वास्तविक सुख समझना |

२ -अस्मिता = आत्मा को मन या बुद्धि समझना |

३ -राग = सुख उत्पन करनेवाली वस्तुओं में तृष्णा |

४ -द्वेष = दु:ख के साधनों में क्रोध |

५ -अभिनिवेश = मृत्यु का भय |

पञ्चक्लेश - तमस , मोह , महामोह , तामिस्त्र ,अन्धतामिस्त्र |

योग के अष्टांग - यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , ध्यान , धारणा , समाधि |

१- यम = अहिंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रहाः  यमाः |

  अहिंसा - "सर्वभूतानां  अनदिद्रोहः" प्राणियों को किसी प्रकार की पीड़ा न पहुचाना |

   सत्य - वान्गमनसयोः एकरुपता यथादृष्टस्य श्रुतस्य तदरूपेणाभिब्यक्ति:|जो वस्तु जिस प्रकार देखी हो आप्त पुरुषो से सुनी                 हो  उसे उसी प्रकार मन मे रखना तथा दुसरे से कहना सत्य होत है |

अस्तेय - चौर्याभावः परद्रव्यस्य अहरणम् |दुसरे के द्रव्य कि चोरी न करना |

ब्रह्मचर्य - जितेन्द्रियता इन्द्रियो को वश मे रखना अपरिग्रह- पर द्रब्य को स्वीकार न करना दोषपूर्ण तरीके से द्रब्य का अर्जन रक्षण न करना |

अपरिग्रह - पर द्रव्य को स्वीकार न करना दोषपूर्ण तरीके से द्रब्य का अर्जन रक्षण न करना |

२- नियम = "शौच सन्तोष तपः स्वध्यायेश्वर प्रणिधानानि नियमा" | वह्यान्तर शुद्धता रखना , आवश्यकता से अधिक वस्तुयों की इच्छा न करना , सुख - दु:ख , आतप ,शीत , भूख , ध्यान आदि सहन करना | मोक्षशास्त्रों का अध्ययन करना , इश्वर को भक्तिपूर्वक सभी कामो को समर्पित करना |

३ - आसन ="स्थिर सुखमासनम् " स्थिर होकर देर तक सुख से बैठने वाली स्थिति में रहना बैठने की स्थिति पद्मासन ,सिद्धासन ,शीर्षासन आदि योगासन |

४ -प्राणायाम ="तस्मिन सति श्वासप्रश्वासयोः गति विच्छेद प्राणायामः" स्थिर होकर श्वास प्रश्वास की गति को नियमित रोकना प्राणायाम कहलाता है | यह तीन प्रकार का होता है | पूरक , रेचक , कुम्भक ,|

                               दह्यान्ते  ध्यायमानानां धातूनां हि यथा मलाः |                                                                                                                    

                               तथेन्द्रियानां दह्यान्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात ||

५- प्रत्याहार = "स्वविषयसंप्र्योगे चित्तस्य स्वानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः" इन्द्रियों को उनके विषय से हटाकर उन्हें अन्तरमुखी करना प्रत्याहार कहलाता है |

६- धारणा = देशबन्धश्चित्त्स्य , चित्त को किसी स्थान में स्थिर कर देना धारणा है | जैसे -चित्त को नाभिचक्र या अन्य स्थान में स्थिर कर देना

७ - ध्यान =  "तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् " एकाग्रचित्त को ध्येय वस्तु के साथ एकाकार रूप में प्रवाहित करना ध्यान कहलाता है |एक ही वस्तु का एकाग्रचित्त से चिंत्तन करना उसमे लीन होना ध्यान कहलाता है |

८ -समाधि = "तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरुप शून्यमिव समाधिः" विक्षेप को हटाकर चित्त को स्थिर करना समाधि है | यह दो प्रकार की होती है | सम्प्रज्ञात , असम्प्रज्ञात|

सम्प्रज्ञात- जब चित्त किसी एक विषय पर एकाग्र होता है तब उसकी वही एकमात्र वृत्ति रहती रहती है | अन्य सभी वृत्तिया नष्ट हो जाती है | इस अवस्था को सम्प्रज्ञात समाधि कहते है | इस समाधि में कोई न कोई आलम्बन रहता है ज्ञान माता ज्ञेय की भावना बनी रहती है

असम्प्रज्ञात - जब चित्त का बंधन सभी विषयो से छुट जाता है तब असम्प्रज्ञात समाधि कहलाती है | इसमे चेतना निर्बोध होती है | इसमे ज्ञान ज्ञाता तथा ज्ञेय की भवना बनी रहती है |

ईश्वर - योग में इश्वर का महत्त्व व्यवहरिक दृष्टि से अधिक है | इश्वर ध्यान के विषय साधनों में एक महत्त्वपूर्ण साधन है | इश्वर अपनी कृपा से उपासको के पाप और दोष दूर करके उअनके लिए योग मार्ग को सुगम बनता है किन्तु मनुष्य को योग द्वारा अपने ईश्वर की कृपा के योग्य बनना चाहिये | योग में ईश्वर को पुरुष विशेष कहा गया है |ईश्वर नित्य सर्वव्यापी , सर्वग्य एवं सर्वशक्तिमान है | ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास श्रुति सम्मत है | ज्ञान एक शक्ति मत्राए भिन्न - भिन्न पाई जाती है , अतः कोई ऐसा पुरुष  है जो सर्वाधिक ज्ञानी और शक्तिशाली हैं वह ईश्वर ही है | सृष्टि का प्रारम्भ पुरुष और प्राकित के सयोग से होता है | पुरुष और प्रकृति के सयोंग का कोई  न कोई कारण होना चाहिए यह कारण ईश्वर ही है | अद्रिस्तो के अनुशार संसार की रचना जिसमे जीवो के अच्छे - बुरे कर्मो का फल मिलता  है | ऐसा सर्वग्य ईश्वर ही कर सकता है | अतः ईश्वर है ||

एतिह्य-

            १-ब्रह्मा                                     योग का उपदेश

            २-पतंजलि                                ४५० ई. पूर्व     योगसूत्रम्

            ३-अज्ञात                                    व्यासभाष्य

            ४-भोज                                       १०० ई. ई. पूर्व     भोजवृत्ति

            ५-वाचस्पति मिश्र                        तत्ववैशारदी

            ६-विज्ञानभिक्षु                             योगवार्तिक

                                                         आसन

योगसुत्र मे पतंजलि ने आसनो के बारेमे कुछ नही बताया है, स्थिरतां और सुखपुर्वक जीसमे बैठ सके वोही उपयुक्त आसन कहा गया है "स्थिरसुखम्‌ आसनम्‌" - ह.प्र लेकिन हठयोग प्रदिपिका मे स्वात्माराम ने बहोत आसनो का वर्णन किया है । आसन एक विशिष्ट प्रकार की अवस्था है जिससे नाडी मे प्राणसंचार महेसुस करना होता है । आसनो के अभ्यास से कुंडलिनी जागरण को सहायता मिलती है, हठयोग के प्रमाणभुत ग्रंथ हठयोग प्रदिपिका, घेरंड सहिंता, गोरक्ष सहिंता इत्यादि मे आसनो के वर्णन करते कहा गया है कि आसन का हेतु कुंडलिनी जाग्रुति करना है ।

मत्स्येन्द्रासन का वर्णन करते हुए स्वात्माराम हठयोग प्रदिपिका मे कहेते है

"मत्स्येन्द्रपीठं जठरप्रईप्तिं प्रचंडरुग्मंडल खंड्नास्त्रम्‌

अभ्यासत: कुंडलिनीप्रबोधं चंद्रस्थिरत्वं च ददाति पुसांम्‌" - ह.प्र १/२७

मत्स्येन्द्रासन से जठराग्नि प्रदिप्त होता है, रोगो का समुह को नाश करता है और उसका अभ्यास से कुंडलिनी जाग्रत होती है ।

आसनोमे शिर्षासन,सर्वांगासन, हलासन, पश्चिमोत्तासन, मत्स्येन्द्रासन, गोमुखासन, कुर्मासन, कुकुट्टासन, 

मयुरासन, शवासन,पद्मासन, सिद्धासन इत्यादि मुख्य्त्वे है |  

आसन से आरोग्य, शरीर के अंगो मे कोमलतां एवं स्थितिस्थापकतां बनती है ।

"हठस्य प्रथमांगत्वादासनं पुर्वमुच्यते

कुर्यात्दासनं स्थैर्यमारोग्यं चांग्लाघवम्‌" - ह.प्र १/१७

मनुष्य जीवन की आपाधापी मे जीवन के हार्द को भुल गया, उठना, बैठना, सोना, खाना पीना सब यांत्रिक हो गया इन सब के बीच का सामंजस्य टुट गया, आखिरकार हमारा शरीर भी एक यंत्र के समान है अगर उसको सहि सहि ढंग से नहि चलाय जाये तो वह आध्यात्मिक यात्रा तो दुर मगर सांसारिक यात्रा करने के लायक भी नहि रहेगा । आसन साधता है तो बस आसन ही साधता रहेता है , सब आसन साध लेगा मगर मनुष्यासन भुल जायेगा –

"केवलं राजयोगाय हठविध्या पदिष्यते" स्वात्माराम कि यह उक्ति यहां याद रखने जैसी है कि केवल राजयोग के लिये ही हठयोग का उपदेश करते है ।

हमारा शरीर एक सेतु है सांसारिकता से आध्यात्मिकता कि और ले जाने का अगर शरीर ही कमजोर रहेगा तो यात्रा कर पाना मुश्किल होगा - "शरीर माध्यम खलुधर्मसाधनम्"

आध्यात्मिक यात्रा मे आंतरिक और बाह्य शरीर का निर्मल होना बहोत आवश्यक है, खास कर के आंतरिक नाडिओं का शुद्ध होना अत्यंत जरुरि है अन्यथा यात्रा करना असंभव हो जायेगा - "मलाकुलासु नाडिषु मारुतो नैव मध्यग:" अगर नाडियां मल से युक्त है तो प्राण सुषुम्णा मे प्रवेश नहि करता ।

आसनो के बारे मे योग के ग्रंथ क्या कहेते है

"स्थिरसुखमासनम्"

सुखपुर्वक बैठने कि स्थिति को आसन कहेते है

"प्रयत्नशैथिल्यानन्त समापत्तिभ्याम"

बिना प्रयत्न के और अनन्त पर ध्यान केन्द्रित करने से यह सिद्ध होता है

ततो द्वंदानभिघात:

इससे द्वंदो का आघात नहि लगता

"कुर्यातदासनं स्थैर्यआरोग्यं चांगलाघवम्"

आसन स्थिरता, आरोग्य और अंगो मे स्थितिस्थापक्ता प्रदान करता है

"आसनेन भवेद्दढम"

आसन से निश्च्यात्मक्ता बढती है

पुर्वतैयारी:

"लेक ओफ प्रिपरेशन इस कोज़ ओफ डिप्रेशन" उक्ति के अनुसार हर शुभ कार्य करने से पहेले पुर्वतैयारी आवश्यक है अन्यथा कर्ता सफ़लता का पुर्वानुमान नहि कर सकता । पुर्वतैयारी के रुप मे कुछ महत्व के पहेलुंए इस तरह है :

१) खाली और मल रहित पेट / अंतडीओ की स्थिति का होना आसन करने के लिए अत्यंत आवश्यक है ।

२) आसन ले नित्य क्रम के लिए ६ लंबाइ और २.५ फिट चौडाइ का एक आसन तैयार करे जीसे रोज इस्त्माल करे,

बाजार से रेडीमेड योगामेट मीलता है वह भी इस्त्माल कर सकते है अन्यथा कंबल या चटाई भी फोल्ड करके उपयोग कर सकते है ।

३) अगर स्नान करके योगाभ्यास करते है तो शरीर मे थोडा ज्यादा लचिलापन महेसुस करेगे अन्यथा स्नान के पहेले भी योगाभ्यास कर सकते है ।

४) योगाभ्यास का कार्यक्रम क्रमश: प्रार्थना, ओमकार, आसन, प्राणायाम, जप और ध्यान रखें प्राणायाम और जप और ध्यान ज्यादा महत्वपुर्ण है उसके लिए ज्यादा समय निकाले ।

५) योगाभ्यास का समय सुबह ५ से ८ अथवा शाम ६ से ८ उपयुक्त है उसके मुताबीत कोइ भी समय निश्चित करें ।

६) शांत, सुंदर एवं स्वच्छ पसंद किया हुआ स्थान योगाभ्यासमे आसानी और प्रसन्नता प्रदान करता है ।

७) व्याधि, साधन मे अकर्मण्यता (आज करेगे कल करेगे ऐसी भावना), संशय, प्रमाद, शरीर मे भारीपन, वैराग्य का अभाव,  योगाभ्यास के दौरान भ्रान्ति होना, योगानुकुल स्थिति कि प्राप्ति न होना और प्राप्त हुइ स्थिति का न ठहेरना ये नौ प्रकार की कठिनाइयां साधना मे बाधा डालती है, ये सब बाधाओ मे विवेकञान पुर्वक साधक को शनै शनै आगे बढना है ।

८) जरुरीयात पडने पर योगाचार्य का मार्गदर्शन लेना आवश्यक है ।

९) आसन मे शरीर की मुवमेन्ट स्लो एवं धिमी गति से करें और स्थिरता को ज्यादा महत्व दें ।

१०) सांस की रिधम के साथ आसन करे ।

११) कोइ भी आसन करना अपने शरीर के लचिलेपन पर निर्धारीत है, सब साधको का शारिरीक लचिलापन भिन्न भिन्न रहेता है इसिलिए साधक को अपने शारिरीक लचिलेपन की क्षमता के अनुसार आसन करना चाहिए ।

१२) कुछ आसन अपने कर्मेन्द्रिय (हाथ पैर) के अनुसार दोनों दिशा में करना जरुरी है उन्हें दोनों दिशा में करे : जैसे की त्रिकोणासन, मत्स्येन्द्रासन, वक्रासन, मर्कटासन, वृक्षासन, ध्रुवासन, गौमुखासन, ब्रह्मचर्यासन, गरुडासन, वतायानासन, जानूसिरासन इत्यादि |

१२) सफलता असफलता विधाता के हाथ मे छोडकर सफलता के बारे मे ज्यादा अपेक्षा ना रखे, धैर्य, विर्य और विवेकज्ञान से योगाभ्यास मे सफलता की कुंजी है ।

१३)हर आसान के आवर्तन अपनी जरूरियात के अनुसार करे, योग में आसान के कितने आवर्तन किये वह महत्वपूर्ण नहीं है बलके आसान कैसे करते है वह महत्वपूर्ण है |

१३)आसन के एक से ज्यादा आवर्तन करना महत्वपूर्ण नहीं है बलके आसन में पर्याप्त समय तक स्थिर रहेना महत्वपूर्ण है |

संगदिल साफल्य वफ़ाइ न जाने, अभी अभी तो पुरुषार्थी का था

अब प्रारब्धवादी की माने, संगदिल साफ़ल्य वफ़ाइ न जाने ।

आसनो का वर्गीकरण : स्थिति के अनुसार

खडे खडे करने के आसन :

हस्तपादासन, त्रिकोनासन, उत्कटासन, ताडासन, ध्रुवासन,व्रुक्षासन, 

उष्ट्रासन, वातायनासन, गरुडासन इत्यादी ।

बेठके करने के आसन:

पश्चिमोतासन, वक्रासन, मत्स्येन्द्रासन, 

अर्धमत्स्येन्द्रासन,मालासन, जानु सिरासन, पाद 

स्कंधासन, गौमुखासन,ब्रहमचर्यासन, विरासन, 

भद्रासन, आकर्ण धनुरासन,शशांकासन, मार्जरासन इत्यादी ।

पीठ के बल करने के आसन

शवासन, पवन मुक्तासन, उत्तान पादासन, सर्वांगासन, सेतुबंधासन, 

हलासन, नौकासन, मर्कटासन, चक्रासन इत्यादी ।

पेट के बल करने के आसन

भुजंगासन, शलभासन, विपरीत नौकासन, धनुरासन, 

मुवमेन्ट के अनुसार आसनो को

समतुलानत्मक आसन

चक्रासन, व्रुषिकासन, मयुरासन, बकासन, शिर्षासन,ध्रुवासन, 

सर्वांगासन इत्यादी

आगे जुकने के आसन 

(फोरवर्ड बेन्डीग)

पाद हस्तासन, पश्चिमोतासन, मालासन, पवन मुक्तासन,

हलासन इत्यादी ।

पीछे जुकने के आसन (बेकवर्ड बेन्डीग)

चक्रासन, शलभासन, व्रुषिकासन, उष्ट्रासन, धनुरासन,

भुजंगासन इत्यादी ।

बाजु और मुड ने के आसन (ट्विस्टींग)

वक्रासन, मर्कटासन, अर्ध मत्स्येन्द्रासन, मत्स्येन्द्रासनइत्यादी

बाजु पर जुकने के आसन 

(साइडवर्ड बेन्डीग)

त्रिकोनासन

आसनो का वर्गीकरण :

ध्यान के अनुसार

पद्मासन,सिद्धासन, वज्रासन, स्वस्तिकासन, समासन, 

अर्धपद्मासन गौमुखासन, ब्रहमचर्यासन इत्यादी ।

आसनो का वर्गीकरण : 

एकाग्रता के माध्यम के अनुसार

मस्तक केन्द्रिय आसन,

नाभि केन्द्रिय आसन,

मेरुदंड केन्द्रिय आसन,

हाथ पैर केन्द्रिय आसन

ताडासन

नाम संदर्भ :

इस आसान में साधक की स्थिति ताड़ी नामक पैड की तरह होती है, वह पैड की विशिष्टता उसकी ऊंचाई है, सामान्यतः इस आसान में साधक की अवस्था कुछ ऐसी होने के कारण इस आसान का नाम ताडासन रखा गया है |

प्रक्रिया

·        पैर के बिच में एक फुट का अंतर रखके आसन पर खड़े रहे |

·        साँस लेते हुए दोनों हाथो को सामने से लेते हुए ऊपर उठाए, दोनों हथेली की अवस्था आमने सामान रहेगी |

·        हाथ ऊपर उठाते हुए पैर की एडिया भी ऊपर उठाये |

·        प्राप्त ताडासन की स्थिति को १०/ १५ सेकण्ड बनाये रखे |   

·        साँस छोडते हुए हाथ और एडियो को पूर्वस्थिति में वापस लाए |

·        फायदे:

·        हाईट बढ़ाने में मददरूप बनाता है |

·        रेस्पिरेटरी सिस्टम को कार्यक्षम बनाता है |

सावधानी

योगीक ग्रंथो में ताडासन

 व्रुक्षासन

 नाम संदर्भ :

जैसे पेड अपने तने पर स्थिर रहेता है वैसे इस आसान में साधक पेड (वृक्ष) की भांति एक पैर पर खड़ा रहेता है इसीलिए इसका नाम वृक्षासन दिया

है |

प्रक्रिया:

·    पैर के बिच में एक फुट का अंतर रखके आसन पर खड़े रहे |

·    दांये पैर के पंजे को दांये हाथ से उठाकर बांये पैर की जांघ के

·    मूल में लगाये |

·    समतूला बनाने के बाद दोनों हाथो से नमस्कार मुद्रा बनाए |

·    खुली आंख से समतूला प्राप्त करने के बाद आंखे बंध कर समतूला बनाने का प्रयास करे |

·    प्राप्त वृक्षासन की स्थिति को १० से १५ सेकण्ड तक बनाये रखे |

·    विपरीत क्रम से वापस आये |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में व्रुक्षासन

ध्रुवासन

नाम संदर्भ :  

एक मान्यता के अनुसार भक्त ध्रुव ने इस आसान में रहे के तपश्चर्या की थी इसीलिए इस आसान को ध्रुवसन कहेते है |

प्रक्रिया

·    पैर के बिच में एक फुट का अंतर रखके आसन पर खड़े रहे |

·    दांये पैर के पंजे को दांये हाथ से उठाकर बराबर नाभि के निचे स्थिर करे यहाँ दांये पैर की एडी और पंजा ऊपर की दिशा में रहेगा | समतूला बनाने के बाद दोनों हाथो से नमस्कार मुद्रा बनाए |

·    खुली आंख से समतूला प्राप्त करने के बाद आंखे बंध कर समतूला बनाने का प्रयास करे |

·    प्राप्त वृक्षासन की स्थिति को १० से १५ सेकण्ड तक बनाये रखे |

·    विपरीत क्रम से वापस आये |

·         

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में ध्रुवासन  

नटराजासन

नाम संदर्भ :  

भगवान सदाशिव का एक नाम नटराज भी है, इस आसान में प्राप्त स्थिति नटराज की मूर्ति की तरह होने की वजह से इसका नाम नटराजासन रखा गया है |

प्रक्रिया

·        पैर के बिच में एक फुट का अंतर रखके आसन पर खड़े रहे |

·        दांये पैर को ऊपर उठाकर बांये पैर की तरफ घुटने से मोड कर रखे, यहाँ दांया पैर हवामे रहेगा जबकी बांया पैर पर शरीर स्थिर रहेगा |

·        अच्छी समतूला बनाने के बाद दोनों हाथो को कंधे की दिशा में फैलादे |

·        प्राप्त नटराजासन की स्थिति को १० से १५ सेकण्ड तक बनाये रखे |

·        विपरीत क्रम से वापस आये |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में  नटराजासन

कोणासन

नाम संदर्भ :

आसन का आकार कोने जैसा होने से इसको कोणासन कहेते है |

प्रक्रिया

·        दोनों पैर आगे फैलाकर बैठ जाये |

·        दोनों हाथ के पंजे कमर के पीछे जमीं पर टिकाये, दोनों हाथ की उंगलियो की दिशा अंदर की तरफ रहेगी |

·         साँस लेते हुए, हाथ और एडियो के बल से कमर, पीठ, गर्दन को ऊपर उठाये, घुटनों से लेके गर्दन तक शरीर को एक रेखा में सीधा करे |

·        पैर के पंजे को जमीन पर सटके रखे |

·        द्रष्टि ऊपर की तरफ रखे |

·        प्राप्त कोणासन की स्थिति को १० से १५ सेकण्ड तक बनाये रखे |

·        साँस छोड़ते हुए, विपरीत क्रम से वापस आये |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में कोणासन

त्रिकोणासन १/२

नाम संदर्भ :

यह आसन पूर्णावस्था में त्रिकोण की आकृति जैसा दिखता है इसीलिए इसे त्रिकोणासन कहेते है |

प्रक्रिया

·        दोनों पैर के बिच दो फिट का अंतर रखके खड़े रहे |

·        दांये हाथ को ९० डिग्री तक ऊपर उठाये, हथेली आकाश की तरफ रहेगी |

·        बांये हाथ की हथेली सीधी अवस्था में शरीर से सटके रहेगी |

·        साँस लेते हुए, कमर से बांयी तरफ जुकना शुरू करे, इसके साथ साथ बांये हाथ की हथेली को निचे पैर की पिंडियो की तरफ सरकने दे

·        आसन की पूर्णावस्था में कमर और दोनों हाथ पर  ९० डिग्री का कोना बनेगा |

·        दांया हाथ जमीन के समान्तर रहेगा जबकि बांया हाथ जमीन पर लम्ब स्वरूप में बांये पैर की पिंडि से सटके रहेगा |

·        द्रष्टि सामने रखे |

·          प्राप्त कोणासन की स्थिति को १० से १५ सेकण्ड बनाये रखे |

·         साँस छोड़ते हुए, विपरीत क्रम से वापस आये

·        दूसरी दिशा में भी आसन को दोहराए |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में त्रिकोणासन

समतोलासन

नाम संदर्भ :

इस आसन में विशिष्ट रूप से शरीर की समतूला बनाये रखनी पड़ती है इसीलिए इसे समतुलासन कहेते है |

  

प्रक्रिया

·        दोनों पैर के बिच में २ से २.५ फिट का अंतर रखके खड़े रहे |

·        दांये पैर के पंजे और गर्दन को दांयी तरफ ९० डिग्री घुमाए |

·        इस अवस्था में बांया पैर पीछे की दिशा में रहेगा |

·        बांये पैर को ऊपर उठाकर घुटनों से मोडे, इस अवस्था में बांये पैर का पंजा आकाश की तरफ रहेगा |

·        बांये हाथ को आकाश की तरफ ऊपर उठाये |

·        ऊपर उठाये बांये हाथ से बांये पैर के पंजे को पकडे |

·        दांया हाथ जमीन के समान्तर सीधा करे |

·        द्रष्टि दांये हाथ की उंगलियो की तरफ रखे |

·         प्राप्त समतुलासन की स्थिति को १० से १५ सेकण्ड तक बनाये रखे |

·        दूसरी दिशा से भी आसन को दोहराए |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में समतोलासन

गरुडासन

नाम संदर्भ :

आसन की स्थिति गरुड़ जैसी होने से इसे गरुडासन कहा जाता है |

प्रक्रिया

·        दोनों पैर जोड़ के आसन के उपर खड़े रहे |

·        दांये पैर की बांये पैर के ऊपर आंटी लगा दे |

·        दांया हाथ ऊपर रखके, दोनों हाथो का क्रोस बनाये |

·        दोनों हाथो की हथेलिया नमस्कार मुद्रा में मिला दे  |

·        द्रष्टि सामने रखे |

·        इस अवस्था में शरीर का संतुलन बांया पैर पर रहेगा |

·        प्राप्त गरुडासन की स्थिति को १० से १५ सेकण्ड तक बनाये रखे |

·        विपरीत क्रम से वापस आये  |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में गरुडासन

पाद हस्तासन

नाम संदर्भ :

यह आसन हाथ (हस्त) और पैरो (पाद) को नजर समक्ष रखके किया जाता है इसीलिए इसे पादहस्तासन कहेते है |  

 प्रक्रिया:

·        दोनों पैर जोड़ के आसन पर खड़े रहे |

·        साँस लेते हुए दोनों हाथ आकाश की तरफ ऊपर उठाये, हथेलिया सामने की तरफ रहेगी |

·        साँस छोड़ते हुए कमर से निचे जुके, और हाथो से दोनों पैर के अंगूठे को पकडे | शुरुआत में जितना हो सके उतना ही निचे जुके, दोनों पैर के अंगूठे पकडना अनिवार्य नहीं है, हाथो को धीरे धीरे पैर के अंगूठे की तरफ खींचे कुछ समय पर्यंत सफलता मिलेगे, जुकते वक्त कमर को जटका न दे,  घुटनों को सीधा रखे | शुरुआत में दोनों पैर जोड़ के रखेगे तो संतुलन बनाने में कठिनाई आ सकती है ऐसी परिस्थिति में दोनों पैर के बिच एक फुट का अंतर रखे |

·        प्राप्त पादहस्तासन की स्थिति को १० से १५ सेकण्ड स्थिर बनाये रखे, इसके दौरान साँस की गति नोर्मल रखे |

·        विपरीत क्रम से वापस आये |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में पाद हस्तासन

भूमी वंदनासन

नाम संदर्भ :  

प्रक्रिया

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में भूमी वंदनासन

उत्कट्टासन-1

नाम संदर्भ :

उत् अर्थात ऊपर और कट अर्थात नितंब, इस आसान में दोनों नितंबो को ऊपर उठाकर रखना होता है इसीलिए इसे उत्कटासन कहेते है |

प्रक्रिया

·        दोनों पैरों के बिच में एक फुट का अंतर रखके पैर के पंजे ऊपर बैठे |

·        दोनों हाथ की कलाई को दोनों पैर के घुटनों पर टिकाये |

·        धीरे से दोनों एडी को ऊपर उठाये और शरीर  के वजन को दोनों पैर की उंगलियो के ऊपर स्थित करे |

·        प्राप्त उत्कटासन की अवस्था में १० सेकण्ड तक स्थिर रहे |

·        विपरीत क्रम से वापस आये |

·        आसान के तिन आवर्तन करे |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में उत्कट्टासन

उत्कट्टासन-2

नाम संदर्भ : 

उत् अर्थात ऊपर और कट अर्थात नितंब, इस आसान में दोनों नितंबो को ऊपर उठाकर रखना होता है इसीलिए इसे उत्कटासन कहेते है |

प्रक्रिया

·        दोनों पैर के बिच में एक फुट का अंतर रख के खड़े रहे

·        अब साँस निकलते हुए तिन प्रक्रिया एक साथ करेगे 

·        खुर्शी पर बैठने की अदा में घुटनों से जुकना, पैरों की एडियो को ऊपर उठाना, और दोनों हाथो को सामने की और सीधा करना |

·        हाथ की हथेलिया जमीन की तरफ रहेगी |

·         प्राप्त उत्कटासन की स्थिति में १० सेकण्ड स्थित रहे |

·        विपरीत क्रम से वापस आये |

·        आसन के तिन आवर्तन करे |

·         

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में उत्कट्टासन

पादांगुष्ठासन

नाम संदर्भ :

इस आसान में शरीर को पैर की उंगलियो पर स्थिर रखा जाता है इसीलिए इसे पादांगुष्ठासन कहेते है |

प्रक्रिया

·        दोनों पैर के बिच एक फुट का अंतर रखके खड़े रहे |

·        पैर के पंजे ऊपर बैठे |

·        दोनों घुटनों को आगे लेते हुए जमीं पर टिकाये, यहाँ शरीर का वजन दोनों घुटने एवं पैर की उंगलियो पर आएगा |

·        दांये पैर की एडी को दोंनो नितंब के बिच में योनिस्थान में स्थित करे |

·        अब दांये पैर को उठाकर बांये पैर की जांघ पर रखे, यहाँ शरीर का वजन एक पैर के एक घुटने पर और पैर की उंगलियो पर स्थिर रहेगा |

·        दोनों हाथो की नमस्कार मुद्रा बनाये |

·        प्राप्त पादान्गुष्ठासन की स्थिति को कुछ सेकेण्ड तक बनाये रखे |

·        विपरीत क्रम से आसन की स्थिति को छोड़े |

·        आसन के दो से तीन आवर्तन करे |

·        पैरों के स्थान बदलकर आसन को दोहराए |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में पादांगुष्ठासन

वातायनासन

नाम संदर्भ :

यहाँ वातायन का अर्थ घोडा होता है, इसके अनुसार यह आसान में प्राप्त आकृति घोड़े की समान होने से इसे वतायनासन कहेते है |

प्रक्रिया

·        दोनों पैर के बिच १ फुट का अंतर रखके खड़े रहे |

·        दांये पैर को घुटने से मोड कर एडी को बांये पैर की जांघ के मूल में लगाये |

·        यहाँ शरीर दांये पैर पर स्थिर रहेगा |

·        बांये पैर के घुटने से नीचे जुककर दांये पैर के घुटने को जमीन पर स्थिर करे |

·        दोनों हाथो को क्रोस स्वरूप में सामने की और सीधा करे |

·        दोनों हाथ की हथेलियो को नमस्कार मुद्रा में मिलादे |

·        द्रष्टि उंगलियो के सिरे पर रखे |

·        अवस्था को कुछ सेकण्ड तक बनाये रखे |

·        आसन के दो से तिन आवर्तन करे |

·        पैरों के स्थान बदलकर आसन को दोहराए |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में वातायनासन

शीर्षासन

नाम संदर्भ :

यह आसन प्रक्रिया में शरीर को सिर के ऊपर स्थिर रखना होता है इसीलिए इसका नाम शीर्षासन रखा गया है |

  

प्रक्रिया:

·        पैर के पंजे पर बैठे |

·        निचे जुककर दोनों हाथ का सहारा लेके सिर को जमीन पर टिकाये |

·        दोनों हाथो उंगलियो को एक दूसरे से गूँथकर सिर पीछे लगाये |

·        दोनों पैरों को घुटने से सीधा करके पंजे को थोडा अंदर की और ले |

·        घुटने से पैर को मोड के, कमर से शरीर हवा में ऊपर उठाये, इसके दौरान पैर के घुटने को मुडा हुआ ही रखे, इस अवस्था में दोनों जांघे छाती से चिपकी रहेगी |

·        अब शरीर को कमर से सीधा करके घुटने को आकाश की तरफ करे, इस अवस्था में दोनों घुटने की दिशा आकाश की तरफ रहेगी और दोनों पैर पीठ की तरफ पीछे रहेगे |     

·        अब दोनों पैर को घुटने से सीधा करके पैर के पैर के पंजे को आकाश की दिशा के स्थित करे |

·        प्राप्त शीर्षासन में कुछ सेकण्ड तक संतुलन बनाये रखे |

·        विपरीत क्रम से पूर्व स्थिति में वापस आये |

·        आवर्तन को दो से तिन बार दोहराए |

         

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में शीर्षासन

विरासन

नाम संदर्भ :  

प्रक्रिया

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में वीरासन 

उष्ट्रासन

नाम संदर्भ :

उष्ट्र अर्थात ऊंट (camel), इस आसन की प्राप्त स्थिति में आकृति ऊंट जैसी बनती है इसीलिए इसे उष्ट्रासन कहेते है |

प्रक्रिया

·        आसन के ऊपर घुटने के बल खड़े रहे |

·        शरीर को कमर से पीछे की और मोड के हाथो से दोनों पैर की एडिया पकडे |

·        जांघ और पेट को आगे की तरफ खींचे |

·        द्रष्टि पीछे की और करे |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में शीर्षासन

वज्रासन

नाम संदर्भ :

वज्र अर्थात मजबूत, इस आसन पुरुष को मजबूती प्रदान करता है इसीलिए इसे वज्रासन कहेते है |  

प्रक्रिया

·        दोनों पैर आगे फैलाके आसन पर बैठे |

·        दांया पैर मोडकर दांये नितंब के पास रखे , उसी तरह बांया पैर मोड कर बांये नितंब के पास रखे |

·        इस अवस्था में, शरीर का वजन दो हिप्स पर रहेगा |

·        दोनों हाथो की कलाई को घुटने पर रखे और आंखे बंध करे |

·        अनुकूल समय तक आसन पर स्थित रहे |

फायदे

सावधानी 

योगिक ग्रंथो में वज्रासन 

सिंहासन

नाम संदर्भ :

इस आसन में प्राप्त मुखाकृति सिंह के सामान होने से इसे सिंहासन कहेते है | 

प्रक्रिया

·        दोनों पैर आगे फैलाके आसन पर बैठे |

·        बांये पैर को दांये नितंब के निचे रखे और दांये पैर को बांये नितंब के निचे रखे |

·        यहाँ दोनों पैर की कलाई एक दूसरे से क्रोस होगी |

·        दोनों हाथ घुटने पर स्थित करे |

·        थोडा आगे जुककर मुंह को पूरा खोले और जीभ को बहार निकाले |

·        सिंहासन की प्राप्त अवस्था में कुछ सेकण्ड रहे |

·        आसन को दो से तीन बार दोहराए |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में शीर्षासन

गौमुखासन

नाम संदर्भ :  

इस आसन में प्राप्त आकृति गाय की तरह होने से इसे गौमुखासन कहेते है |

प्रक्रिया

·        दोनों पैर आगे फैलाके आसन पर बैठे |

·        दांये पैर को मोडकर बांयी तरफ नितंब के पास रखे |

·        बांये पैर को मोडकर दांयी तरफ नितंब के पास रखे

·        इस अवस्था में दोनों घुटने एक दूसरे पर स्थित होगे |

·        दोनों हाथो को घुटने पर रखे और आंखे बंध करे |

·        प्राप्त गौमुखासन की अवस्था में अनुकूल समय तक स्थित रहे |

·        पैरों के स्थान बदलकर आसन को दोहराए |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में शीर्षासन

ब्रहमचर्यासन

नाम संदर्भ :

यह आसन ब्रह्मचर्य पालन में सहायक है इसिलए इसे ब्रह्मचर्यासन कहेते है |

प्रक्रिया

·        दोनों पैर आगे फैलाके आसन पर बैठे |

·        बांया पैर की एडी को दो नितंब के बिच योनी स्थान में लगाये |

·        दांये पैर को बांये पैर पर से आंटी मारके बांये नितंब के पास लगाये |

·        इस अवस्था में दोनों घुटने एक दूसरे पर स्थित रहेगे |

·        आसन की अवस्था गौमुखासन से मिलती जुलती  है लेकिन गौमुखासन में दोंनो पैर दोनों साइड में रहेते है जब की ब्रह्मचर्यासन में एक पैर गुदास्थान में रहेता है |

·        दोनों हाथो को कलाई से क्रोस करके आरामदायक स्थिति में जांघ पर रखे |

·        आँखे बंध रखे और अनुकूल समय तक प्राप्त ब्रह्मचर्यासन की अवस्था में स्थित रहे |

·        पैरों के स्थान बदलकर आसन को दोहराए |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में ब्रह्मचर्यासन

वक्रासन १/२

नाम संदर्भ :

इस आसन में शरीर की स्थिति वक्र होने के कारन इसे वक्रासन कहा जाता है |  

प्रक्रिया

·        आसन पर दोनों पैर सीधा आगे की और फैलाकर बैठे |

·        दांया पैर घुटने से मोडे, इस अवस्था में घुटना ऊपर और पैर का पंजा जमीन पर रहेगा |

·        बांया हाथ ऊपर उठाकर दांयी तरफ घुमे |

·        बांये हाथ की कोणी को दांये घुटने से लगाये और पीछे मुडकर देखे |

·        प्राप्त वक्रासन की अवस्था को कुछ सेकण्ड तक बनाये रखे |

·        विपरीत क्रम से पूर्वावस्था में वापस आये |

·        हाथ और पैर के स्थान बदलकर आसन को दोहराए |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में वक्रासन 

अर्ध मत्स्येन्द्रासन १/२

नाम संदर्भ :

नाथ संप्रदाय के श्री मत्स्येन्द्रनाथ ने यह आसन की खोज की थी इसीलिए इसे मत्स्येन्द्रासन कहा जाता है | यह आसन का स्वरूप मत्स्येन्द्रासन से आधी तीव्रता वाला है |

प्रक्रिया

·        आसन पर दोनों पैर आगे फैलाकर बैठे |

·        दांये पैर को घुटने से मोडे, इस अवस्था में घुटना आकाश की तरफ रहेगा और पैर का पंजा जमीन पर रहेगा |

·        दांये पैर के पंजे को उठाकर बांयी तरफ बांये घुटने के पास रखे |

·        बांया पैर घुटने से मोडकर दांयी तरफ नितंब के पास लगाये |

·        बांया हाथ ऊपर उठाकर दांये घुटने से दांयी तरफ लगाकर दांये पैर का अंगूठा पकडे |

·        दांया हाथ पीछेसे लेकर बांयी जांघ पर स्थित करे, इस अवस्था में पीछे मुडकर देखे |

·        बनी हुई अर्धवक्रासन की स्थिति में कुछ सेकण्ड तक स्थित रहे |

·        विपरीत क्रम से पूर्वावस्था में वापस आये |

·        हाथ और पैर का क्रम बदल कर आसन को दूसरी ओरसे दोहराए |

·        आसन के ३ से ४ आवर्तन करे |

  

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में अर्ध मत्स्येन्द्रासन 

पुर्ण मत्स्येन्द्रासन १/२

नाम संदर्भ :

एक मान्यता के अनुसार यह आसन की खोज मत्स्येन्द्रनाथ ने की थी इसीलिए इसका नाम मत्स्येन्द्रासन रखा गया है |  

प्रक्रिया

·        आसन पर दोनों पैर आगे फैलाकर बैठे |

·        दांया पैर घुटने से मोडकर एडी को नाभि के निचे लगाये |

·        बांये पैर को घुटने से मोडकर दांयी तरफ दांये घुटने के पीछे लगाये |

·        दांये हाथ की कोनी को बांये पैर के घुटने के पीछे लगाये |

·        दांये हाथ से बांये पैर के अंगूठे को पकडे |

·        बांये हाथ से दांये पैर की कलाई पकडे |

·        गर्दन और कमर को मोडकर द्रष्टि पीछे करे |

·        प्राप्त मत्स्येन्द्रासन की अवस्था को कुछ सेकण्ड तक बनाये रखे |

·        विपरीत क्रम से पूर्वावस्था में वापस आये |

·        हाथ और पैर का क्रम बदलकर आसन को दूसरी और से दोहराए |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में पुर्ण मत्स्येन्द्रासन 

जानु सिरासन १/२

नाम संदर्भ :

घुटने को संस्कृत में जानू कहेते है, इस आसन में मस्तक को घुटने से लगाया जाता है इसीलिए इसे जानू सिरासन कहेते है |  

प्रक्रिया

·        आसन पर दोनों पैर आगे फैलाकर बैठे |

·        दांये पैर के पंजे को बांयी तरफ जांघ के मूल में लगाये |

·        दोनों हाथो से बांये पैर के अंगूठे को पकडे |

·        साँस छोडते हुए, मस्तक को दांये बांये पैर के घुटने पर लगाये, याद रहे की मस्तक को घुटने से लगाने के लिए पैर का घुटना मोडना नहीं है |

·        प्राप्त जानू सिरासन की अवस्था को कुछ सेकण्ड तक बनाये रखे |

·        हाथ पैर का क्रम बदलकर दूसरी और से आसन को दोहराए |

·        आसन का तीन से चार आवर्तन करे |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में जानु सिरासन

पश्चिमोत्तासन

नाम संदर्भ :

यह आसन में कुण्डलिनी शक्ति का पश्चिम यानि मस्तक की तरफ उत्थान होता है इसीलिए इसे पश्चिमोत्तासन कहा जाता है | 

प्रक्रिया

·        आसन पर सीधा लेट जाये, दोनों पैर जोड़े हुए रखे |

·        दोनों हाथ ऊपर की तरफ सीधा फैला दे |

·        धीरे धीरे साँस को अंदर लेते हुए बैठक की स्थिति ले, यह क्रिया के दौरान दोनों हाथ ऊपर ही रहेगे |

·         बैठक की स्थिति में आने के बाद साँस को नोर्मल होने दे |

·        धीरे धीरे साँस को छोड़ते हुए दोनों हाथो से दोनों पैर के अंगूठे को पकडे, यह क्रिया के दौरान दोनों पैर के घुटने सीधे रहेगे |

·        मस्तक को दोनों घुटने पर लगाये |

·        प्राप्त पश्चिमोत्तासन की अवस्था को कुछ सेकण्ड तक बनाये रखे |

·        विपरीत क्रम से पूर्वावस्था में वापस आये |

·        हाथ पैर बदलकर आसन को दूसरी और दोहराए |

·        दोनों और आसन के ३-३ आवर्तन करे |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में पश्चिमोत्तासन

उग्रासन

नाम संदर्भ :  

यह आसन का स्वरूप उग्र होने की वजह से उसे उग्रासन कहा जाता है |

प्रक्रिया

·        दोनों पैर आगे फैलाकर आसन पर बैठे |

·        दोनों पैरों को साइड बाई साइड दोनों दिशा में जितना हो सके उतना फैला दे |

·        दोनों हाथो से पैरों के अंगूठे पकडे |

·        साँस छोडते हुए मस्तक को जमीन पर लगाये |

·        प्राप्त उग्रासन की अवस्था को कुछ सेकण्ड तक बनाये रखे |

·        विपरीत क्रम से पूर्वावस्था में वापस आये |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में उग्रासन

आकर्ण धनुरासन १/२

नाम संदर्भ :

यह आसन में कान और हाथ का उपयोग करके धनुष्य जैसा आकार निर्मित होता है इसीलिए इसे आकर्ण धनुरासन कहा जाता है |

प्रक्रिया

·        दोनों पैर आगे फैलाकर आसन पर बैठे |

·        दोनों पैर के घुटने सीधे रखे |

·        हाथो से दोनों पैर के घुटने पकडे |

·        दांये पैर को हाथ से खिंच कर कान तक ले जाये, इस क्रिया के दौरान बांये पैर और हाथ की स्थिति यथावत रहेगी |

·        प्राप्त आकर्ण धनुरासन की अवस्था को कुछ सेकण्ड तक बनाये रखे |

·        विपरीत क्रम से पूर्वावस्था में वापस आये |

·        हाथ और पैर की स्थिति बदल कर दूसरी और से भी आसन को दोहराए |

·        दोनों तरफ ३- ३ बार आसन के आवर्तन करे |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में आकर्ण धनुरासन

भद्रासन

नाम संदर्भ :  

भद्र का अर्थ मंगल होता है, यह आसन सर्व रूप से मंगलकारी होने से इसका नाम भद्रासन रखा गया है |

प्रक्रिया

·        दोनों पैर आगे की तरफ सीधा फैलाकर बैठे |

·        दोनों पैर के पंजे को हाथ से पकड़कर नमस्कार मुद्रा में खिंचकर आगे लाकर योनिस्थान में लगाये |

·        दोनों पैर के घुटने को जमीन पर लगाने की कोशिश करे |

·        प्राप्त भद्रासन की अवस्था को कुछ सेकण्ड तक बनाये रखे |

·        विपरीत क्रम से पूर्वावस्था में वापस आये |

·        आसन के दो से तीन आवर्तन करे |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में भद्रासन

पर्वतासन

नाम संदर्भ :

इस आसन में बनता आकार पर्वत के सामान होता है इसीलिए इसे पर्वतासन कहेते है  |

प्रक्रिया

·        आसन पर पद्मासन में बैठे |

·        दोनों हाथो को दोनों साइड में सीधा रखे, हथेली आकाश की तरफ रहेगी |

·        साँस अंदर लेते हुए दोनों हाथो को ऊपर की तरफ उठाके नमस्कार मुद्रा बनाये |

·        साँस को नोर्मल होने दे |

·        साँस छोड़ते हुए विपरीत क्रम से वापस आये |

·        आसन के ३ से ४ आवर्तन करे |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में पर्वतासन

कुर्मासन

नाम संदर्भ :  

इस आसन में बनता आकार कछुए के सामान होता है इसीलिए इसे कुर्मासन कहेते है, कुर्म का अर्थ संस्कृत में कछुआ होता है |

प्रक्रिया

·        आसन पर वज्रासन में बैठे |

·        दोनों पैरों के अंगूठे और उंगलियो को बहार की और निकाले, इस अवस्था में एडिया अंदर की और रहेगी |

·        कुछ सेकण्ड तक आसन में बने रहे |

·        विपरीत क्रम से पूर्वावस्था में वापस आये |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में कुर्मासन

उत्तान कुर्मासन

नाम संदर्भ : 

इस आसन में बनता आकार कछुए के सामान होता है इसीलिए इसे कुर्मासन कहेते है, कुर्म का अर्थ संस्कृत में कछुआ होता है |

प्रक्रिया

·        आसन पर पद्मासन धारण करे |

·        पद्मासन के साथ लेट जाये |

·        दोनों हाथो को दोनों बाजु से जांघ और पिंडियो की बिच में से पसार करे |

·        दोनों हाथो को गले के आसपास लगाये |

·        कुछ सेकण्ड तक उत्तान कुर्मासन की अवस्था में बने रहे |

·        विपरीत क्रम से पूर्वावस्था में वापस आये |

·        आसन को एक दो बार दोहराए |

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में उत्तान कुर्मासन

मालासन

नाम संदर्भ :  

प्रक्रिया

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में मालासन

एक पाद स्कंधासन

नाम संदर्भ :  

प्रक्रिया

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में एक पाद स्कंधासन

द्विपाद स्कंधासन

नाम संदर्भ :  

प्रक्रिया

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में द्विपाद स्कंधासन

कोणासन

नाम संदर्भ :  

प्रक्रिया

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में कोणासन

सुप्त वज्रासन

नाम संदर्भ :  

प्रक्रिया

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में सुप्त वज्रासन

मत्स्यासन

नाम संदर्भ :  

प्रक्रिया

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में मत्स्यासन

तोलांगुलासन

नाम संदर्भ :  

प्रक्रिया

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में तोलांगुलासन

नौकासन

नाम संदर्भ :  

प्रक्रिया

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में नौकासन

शवासन

नाम संदर्भ :  

प्रक्रिया

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में शवासन

पवन मुक्तासन

नाम संदर्भ :  

प्रक्रिया

फायदे

सावधानी

योगीक ग्रंथो में पवन मुक्तासन

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