भारतीय ज्योतिष् संस्थानम् ट्रस्ट


रजि०  न० ६२९८

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ज्योतिष विभाग :–



ज्योतिष क्या है ?

ज्योतिष शास्त्र की व्युत्पत्ति " ज्योतिषां सूर्यादिग्रहाणाम बोधकं शास्त्रं  " की गयी है अर्थात सूर्यादि ग्रह और काल का बोध कराने वाले शास्त्र को ज्योतिष शास्त्र कहा जाता है |
इसमें प्रधानतः ग्रह, नक्षत्र ,धूमकेतु ,आदि ज्योतिः पदार्थो का स्वरुप संचार ,परिभ्रमण काल ग्रहण और स्थिति प्रभृति समस्त घटनाओं का निरूपण एवं ग्रह , नक्षत्रो की गति ,स्थिति और संचारानुसार शुभाशुभ फलो का कथन किया जाता है
काल की गड़ना ही ज्योतिष है |

ज्योतिष क्या है ?
आकाश की ओर दृष्टि डालते ही मस्तिष्क में उत्कण्ठा उत्पन्न होती है कि ये ग्रह नक्षत्र क्या वस्तु है़ ? तारें क्यों टुटकर गिरतें है ? सूर्य प्रतिदिन पूर्व दिशा में ही क्यों उदित होता है ? ऋतुऐं क्रमानुसार क्यों आती है आदि।

मानव स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि वह जानना चाहता है - क्यों ? कैसे ? क्या हो रहा है ? और क्या होगा ? यह केवल प्रत्यक्ष बातों को ही जानकर संतुष्ट नही होता, बल्कि जिन बातों से प्रत्यक्ष लाभ होने की संभवना नही है, उनाके जानने के लिए भी उत्सुक रहता है। जिस बात को जानने की मानव को उत्कट इच्छा रहती है, उसके अवगत हो जाने पर उसे जो आनंद मिलता है, जो तृप्ति होती है उससे वह निहाल हा जाता है।

ज्योतिष शास्त्र की व्युत्पति- ज्योतिषं सूर्यादि ग्रहाणां बोधकं शास्त्रम् अर्थात् सूर्यादि ग्रहों के विषय में ज्ञान कराने वाले शास्त्र को ज्योतिष शास्त्र कहते है। इसमें प्रधानतः ग्रह, नक्षत्र, धूमकेतु आदि ज्योतिः पदार्थो का स्वरूप, संचार, परिभ्रमण काल, ग्रहण और स्थिति, प्रभृति, समस्त घटनाओं का निरूपण एवं ग्रह नक्षत्र की गति, स्थिति और संचारानुसार शुभाशुभ फलों का कथन किया जाता है। मनीषियों का अभिमत है कि आकाश मण्डल में स्थित ज्योति संबंधी विविध विषयक विद्या को ज्योतिर्विद्या कहते है। ज्योतिष शास्त्र में गणित और फलित दोनों प्रकार के विज्ञानों का समन्वय है। आधुनिक समय में इस शास्त्र को 5 रूपों में बांटकर अध्ययन किया जा रहा है।

ज्योतिष शास्त्र के प्रर्वतक- संपूर्ण ज्योतिष शस्त्र को वेदो का नेत्र कहा गया है। भारतीय संस्कृति की आत्मा को समझने के लिए वेदों का

अध्ययन मनन और चिन्तन परम आवश्यक है। जिस पदार्थ का ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण या अनुमान, प्रमाण से नही होता है। उसकी प्रतीति वेदों

के आधार पर होती है। यही वेदों का वेदत्व या प्रकाशकत्व कहा जाता है। सनातन संस्कृति का आधार आचार है। आचार या आचरण ही

संस्कृति व धर्म का मूल है। तथा समसत आचार यज्ञ प्रधान होने से काल ज्ञान पर निर्भर है। व्यवहार में दैनिक कियाकलापांे का सूयोंदय,

सूर्यास्त, दिनरात, तिथि, मास, पक्षादि के बिना संपन्न नहीं हो सकते है। इनके विश्ष्टि काल संपादन के लिये ज्योतिष शास्त्र आवश्यक है।

ऋषियों, मनीषीयों, आचार्यो ने अपनी ऋतंभरा प्रज्ञा से इसे समय-समय पर परिष्कृत व शंशोधित किया है। ज्योतिष शास्त्र के 18 महर्षि

प्रर्वतक या संस्थापक के रूप् में जाने जाते है। काश्यप् के मतानुसार इनके नाम क्रमशः सूर्य, पितामह, व्यास, वशिष्ट, अत्रि, पाराशर,

काश्यप, नारद, गर्ग, मरीचि, मनु, अंगिरा, लोमश, पौलिश, च्यवन, यवन, भृगु एंव शौनक है।

ज्योतिष शास्त्र के तीन स्कंध होते है।

प्रथम स्कंध ‘‘सिद्धान्त‘‘ - जिसमें त्रुटि से लेकर प्रलय काल तक की गणना, सौर, सावन, नाक्षत्रादि, मासादि, काल मानव का प्रभेद, ग्रह

संचार का विस्तार तथा गणित क्रिया की उपपति आदि द्वारा ग्रहों, नक्षत्रों, पृथ्वी की स्थिति का वर्णन किया गया है। इस स्कंद के प्रमुख ग्रंथ

ग्रह लाघव, मकरन्द, ज्योर्तिगणित, सूर्य सिद्धान्तादि प्रसिद्ध है।

द्वितीय स्कंध ‘‘संहिता‘‘ - इस स्कन्द में गणित को छोड़कर अंतरिक्ष, ग्रह, नक्षत्र, ब्रह्माण्ड आदि की गति, स्थिति एंव ततत् लोकों में रहने

वाले प्राणियों की क्रिया विशष द्वारा समस्त लोकों का समष्टिगत फलों का वर्णन है। उसे संहिता कहते है। वाराह मिहिर की वृहत् संहिता,

भद्र बाहु संहिता इस स्कन्द की प्रसिद्ध ग्रंथ है।

तृतीय स्कंध ‘‘होरा‘‘ - होरा इस स्कन्द में जातक, जातिक, मुहूर्त प्रश्नादि का विचार कर व्यष्टि परक या व्यक्तिगत फलादेश का वर्णन है।

इस स्कन्द के प्रसिद्ध ग्रंथ वृहत् जातक, वृहत् पाराशर होरशास्त्र, सारावली, जातक पारिजात, फलदीपिका, उतरकालामृत, लघुपाराशरी,

जैमिनी सूत्र और प्रश्नमार्गादि प्रमुख ग्रंथ है।

दैवज्ञ किसे कहते हैं - ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता को ‘‘दैवज्ञ‘‘ के नाम से भी जाना जाता है। दैवज्ञ दो शब्दों से मिलकर बना है। दैव + अज्ञ।

दैव का अर्थ होता है। भाग्य और अज्ञ का अर्थ होता है जानने वाला। अर्थात् भाग्य को जानने वाले को दैवज्ञ कहते है। वाराह मिहिर ने वाराह

संहिता में दैवज्ञ के निम्नलिखित गुण बताये है। जिसके अनुसार एक दैवज्ञ का आंतरिक व बाह्य व्यक्तित्व सर्वर्था उदात, महनीय, दर्शनीय व

अनुकरणीय होना चाहिये। शांत, विद्या विनय से संपन्न, शास्त्र के प्रति समर्पित, परोपकारी, जितेन्द्रीय, वचन पालक, सत्यवादी, सत्चरित्र,

आस्तिक व पर निन्दा विमुख होना चाहिये। वास्तविक दैवज्ञ को ज्योतिष के तीनों स्कनधों का ज्ञान होना आवश्यक है।

ज्योतिष की उत्पत्ति का काल निर्धारण आज तक कोई नही कर सका। क्योंकी ज्योतिष को वेदका नेत्र माना जाता है और वेद की प्राचीनता

सर्व मान्य है। संसार का सबसे प्रचीन ग्रंथ वेद माने जाते हैं और वेद के छः अंग है।

                                                               1. शिक्षा
                                                               2. कल्प
                                                               3. व्याकरण
                                                               4. निरूक्त
                                                               5. छन्द
                                                               6. ज्योतिष

मान्यताओं के अनुसार वेद ही सब विद्याओं का उद्गम है। अतः यह स्पष्ट है कि ज्योतिष की उत्पत्ति उतनी ही प्रचीन है जितनी वेदों की।

ज्योतिष वेद का अंग है कहा गया है " वेदस्य निर्मलम चक्षु:" यह वेद का निर्मल नेत्र है |

ज्योतिष शास्त्र के द्वारा ग्रहों का मानव जीवन पर प्रभाव जाना जा सकता है |ज्योतिष शास्त्र के द्वारा मनुष्य के भाग्य, कर्म ,और  जीवन के विषय में भलीभाति जाना जा सकता है

नक्षत्र एवं ग्रहों का मानव जीवन पर प्रभाव कैसे ?

                                     अप्र्त्यक्षाणि शास्त्राणि विवाद्स्तेषु केवलम्

                                      प्रत्यक्षं ज्योतिस्शास्त्रं चन्द्रार्कौ यत्र साक्षिणौ ||

विदित होता है कि ज्योतिष शब्द क संबन्ध आकाश मे (एक निश्चित मार्ग मे )विचरन कर्णे वाले प्रकाश मान ग्रह नक्षत्रो से है

हम जिस आकाश गंगा में रहते है वहा सैकड़ो तारे है उन्ही तारो से मिल कर नक्षत्र बनते है फिर उनसे राशियाँ

हम सभी जानते है की आकाशगंगा में स्थित सभी गृह सूर्य की परिक्रमा करते है एक निशित समय में एक निश्चित धुरी पर जो ग्रह जितना

दूर है अपनी अपनी कक्षा में परिक्रमा करते है

काल सर्प  दोष क्या है ?

सामान्यतः जन्म कुंडली के सारे गृह जब राहु और केतु के बिच में कैद हो जाते है तो उस गृह की स्थिति को काल सर्प योग कहते है 
राहु सर्प का मुख माना गया है और केतु सर्प की पूछ 
काल का अर्थ है मृत्यु 
यदि अन्य गृह योग बलवान न हो तो काल सर्प योग में जन्मे जातक की मृत्यु  शीघ्र हो जाती है यदि जीवित रहता है तो मृत्यु तुल्य कष्ट भोगता है ।

ज्योतिष शास्त्र में इस योग के प्रति मान्यता प्रायः अशुभ फल सूचक ही है |

 सर्प का इस योग से सम्बन्ध

सर्प का भारतीय संस्कृति से अनन्य सम्बन्ध है  एक बार महर्षि शुश्रुत ने भगवान् धन्वंतरि से पूछा हे भगवान् सर्पो की संख्या और उसके भेद बतावें
शुश्रुत के इन वचनो को सुनकर वैद्यो में श्रेष्ठ धन्वंतरि ने कहा -वासुकि जिनमे श्रेष्ठ है ऐसे तक्षकादि सांप असंख्य है ये सर्प अंतरिक्ष एवं पाताल लोक के वासी है पर पृथ्वी पर पाये जाने वाले नाम धारी सर्पो के भेद 80 प्रकार के है 
भारतीय वाङ्गमय में विषधर सर्पो की पूजा होती है । हिन्दू मान्यताओ के अनुसार सर्प को मारना उचित नहीं हां समझ जाता तथा यत्र -तंत्र उनके मंदिर बनाये जाते है ज्योतिष शास्त्र अनुसार नाग पंचमी 
भाद्र कृष्ण अष्टमी तथा भाद्र शुक्ल नवमी को सर्पो की विशेष पूजा का प्रावधान है
 पुराणों में शेष नाग का वर्णन है जिस पर विष्णु भगबान शयन करते है वह भी एक सर्प है सर्पो को देव योनि का प्राणी माना जाता है नए भवन के निर्माण के समय नीव में सर्प की पूजा कर चादी का सर्प का छोङा जाता है

मंगल दोष क्या है ?        मंगलीक दोष कितना ?           

वर -कन्या के मंगलीक दोष  मिलन हेतु उत्तर भारत के ज्योतिषी जो परिपाटी अपना रहे है ,वह बहुत त्रुटिपूर्ण है ,जबकि दक्षिण भारत में प्रचलित परिपाटी बहुत उत्तम ,स्पष्ट ,सराहनीय एवअनुकरणीय है | उत्तर भारत में  यह परिपाटी है की यदि एक कुंडली में मंगल लग्न ,चौथे, सातवें,आठवें या बारहवें भाव में हो और दूसरी कुंडली में भी मंगल इन्ही भावों में हो,तो उसे ठीक मिलान समझा जाता है| एक में दोष कितना है और दुसरे में कितना -यह देखने की कोई पद्धति ही नहीं है | किन्तु दक्षिण भारत में मंगल के दोष को प्रत्येक कुंडली की स्थिति के अनुसार कसौटी पर परख कर निर्णय किया जाता है  अर्थात तालिका के अनुसार दोषों के नंबर स्थिर किये जाते है ,यह पूर्ण न्याय संगत परिपाटी है |

                                                                    मंगल शब्द मंग धातु से अलच  प्रत्यय के योग से बनता है जिसका अर्थ शुभ कल्याणकारी  भाग्यशाली प्रसन्नता आनंद उल्लास कुशल क्षेम कोई भी शुभ घटना आदि है |

किन्तु व्यवहार में देखा जाता है की संतान की कुंडली में मंगल दोष सुनते ही माता के होश उड़ जाते है |

वस्तुतः मंगली दोष को अमंगली दोष कहना चाहिए |

कोई भी पदार्थ काल  स्थान परिस्थिति वशात के लिए शुभ तथा किसी के लिए अशुभ  हो जाता है जैसे शर्करा मीठी वस्तु है अत्यंत ही मद्फ्हुर है परन्तु जिसको मधुमेह की बीमारी है उसके लिए विष के सामान है वैसे ही मंगल दोष हैं |

महाकवि कालिदास ने भी रघुवंश महाकाव्य में   " विषमप्याम्रितम क्वाचिद्भावेद अमृतं वा विश्मिश्वरेछ्या  "   कहा है |आचार्य वराहमिहिर ने मंगल ग्रह के वर्णनानुसार फ़ल् बताते हुए कहा है

                                      विपुल विमल मूर्तिः  किन्शुकाशोक वर्णः

                                      स्फ़ुट्          रुचिरमयुख्स्तप्तताम्रप्रभाभः |

                                      विचरति   यदि मार्गं    चोत्तरं मेदिननीजः

                                      शुभक्रिदवनिपानां    हार्दिदस्च प्रजानाम ||    बृहत्   संहिताः  ६/१३   

                                                                                                                                                                                                                           अर्थात अधिक निर्मल मुर्तिवाला ,किंशुक आयर अशोक पुष्प के सामान वर्ण वाला, स्पष्ट सुन्दर किरणवाला तथा तपाये ताबे के सामान वर्ण वाला मंगल यदि उत्तराक्रन्ति विचरण करे तो राजाओं का शुभ करने  वाला तथा प्रजा को संतोष देने वाला होता है |

             ठीक यही बात गर्ग एवं परासर मुनियों ने कही है|

मंगल ही नहीं प्रायः सभी ग्रह शुभ एवं अशुभ दोनों फल देते है | जब यह स्थिति सभी ग्रहों के साथ है तो

मंगल को ही दोषी क्यों कहा गया है यह विचारणीय तथ्य है |   मंगल के अनेक नाम है  जैसे --कुज ,भौम

,अंगारक ,क्रूर ,आर ,लोहितांग ,अवनेय,क्रुराक्ष ,धरापुत्र ,क्षितितनय (समस्त पृथ्वी वाची शब्दों में पुत्र जोड़कर

),रक्तांग ,कोण ,स्कन्द ,तथा कार्तिकेय आदि  |

आज के युग में मंगली दोष एवं नाडी  दोष इतना भयावह हो गया है की इतने अच्छे संबध जो सामाजिक

मर्यादा के अनुसार सर्वथा उपयुक्त रहते है किन्तु मंगलीदोष एवं नाडी  दोषो के कारण विबाह संबध नहीं हो

पता | क्या वास्तव में ,मंगली दोष या नाडी दोष इतना भयानक है ,इसका परिहार भी है अथवा नहीं |

मंगलीदोष नाडी  दोष ऐसे विषय है जहा ज्योतिषियों में अनेक विरोधात्मक भ्रान्तिया है ,अतः इस तथ्य पर

विधिवत विवेचन की आवश्यकता प्रतीत होती है

                                        मंगल दोष का परिहार

जिन जातको के जन्माग में मंगल अथवा पापग्रहो से मंगली दोष बनता हो  उसमे निम्नलिखित  स्थितिया होने पर दोष का परिहार हो जाता है ||  

 ( १ )  -  यदि सप्तम भाव ,सप्तमेश गुरु एवं शुक्र बलि हो तो मंगली योग निष्फल हो जाता है |

 ( २ )  -   यदि सप्तम भाव , सप्तमेश गुरु एवं शुक्र निर्बल हो अस्त हो पाप ग्रहों से पीड़ित हो तब मंगली दोष   विशेष प्रभावी होता है |

 ( ३ )  - यदि मंगल स्वग्रही ,मूल त्रिकोण या उच्चराशि का होकर किसी भी भाव में स्थित हो तो  मंगली  दोष समाप्त हो जाता है                   

 ( ४ )  - विवाह के समय यदि शुभग्रह ,कारक ग्रह तथा बली ग्रह की दशा चल रही हो तो मंगली दोष का  प्रभाव (स्वल्प या ) नहीं होता  |

 ( ५ )  -  यदि मंगल सप्तम भाव (मेष ,वृश्चिक ) जो की मंगल का ही घर है उस पर दृष्टि डाल रहा हो तो भी मंगली दोष समाप्त हो जाता है |

 ( ६ )  -  यदि मंगल या पापग्रह अस्त हो तो मंगली दोष का प्रभाव नहीं रह जाता है |

 ( ७ )  -  यदि मंगल लग्नादि भावों में उच्च राशि का अथवा नीच राशि का हो तो मंगली दोष का प्रभाव  अत्यंत कम कर देता है |

 ( ८ )  -  वर कन्या की कुण्डली  मंगल यदि जिस स्थान में हो दुसरे की कुण्डली (वर का मंगल हो तो   कन्या की कुण्डली में ,या कन्या का मंगल हो तो वर की कुण्डली में ) उसी स्थान पर शनी से मंगली दोष समाप्त हो जाता है |

 ( ९ )  -  चन्द्रमा  गुरु के साथ यदि लग्न में हो और पापग्रह कही भी हो तो मंगली दोष समाप्त हो जाता है |

 (१०)  -  गुरु एवं शुक्र के लग्न में होने पर भी मंगली दोष निष्फल हो जाता है |

 (११)  -  चन्द्र मंगल के योग होने पर भी मंगली प्रभाव न्यून हो जाता है |

 (१२)  -  मंगल राहू का योग होने पर भी मंगली प्रभाव समाप्त हो जाता है |

 (१३)  -  यदि मंगल या अन्य पापग्रह अस्त हो या नीच राशि के हो तो भी प्रभाव स्वल्प रह जाता है |

 (१४) -  सरल योग अष्टमेश अष्टम में , षष्टेश या द्वादशेश अष्टम स्थान में हो तो मंगली प्रभाव समाप्त हो  जाता है |

 (१५) -  विमल योग द्वादशेश द्वादश में ,षष्टेश या अष्टमेश द्वादश स्थान  में हो तो मंगली दोष  समाप्त हो जाता है |

 (१६)  -  यदि कन्या एवं वर कुण्डली में मंगल एक ही  भाव में स्थित हो जैसे कन्या का मंगल अष्टम में  तथा वर का भी अष्टम में हो तो मंगली दोष समाप्त हो जाता है |

 (१७)  -  अष्टम भाव में गुरु की राशि धनु या मीन हो मंगल स्थित हो तो मंगली का प्रभाव  नहीं होता है |

 (१८)  -  द्वादश भाव में शुक्र  की राशि ब्रष या तुला हो वहा मंगल स्थित हो तो मंगली का प्रभाव  नहीं हो   पाता है |

 (१९) -  सिंह लग्न या कर्क लग्न (दोनों में मंगल शुभ कारक हो जाता है ) हो तो किसी भी भाव का   मंगल अशुभ फल नहीं  देता है |

 (२०) -  केतु के नक्षत्र (अश्विनी ,मघा ,मूल )में यदि मंगल स्थित होकर किसी भी अशुभ स्थान में हो तो मंगली का प्रभाव नहीं रह जाता है |

 (२१) -  मंगल शैशवावस्था ,वृध्दावस्था अथवा म्रतावस्था का होकर किसी भी अशुभ स्थान  में स्थित हो तो भी मंगली दोष का प्रभाव नहीं होता है |

 (२२) - मंगल या पापग्रह लग्न व्ययादि  किसी भी स्थान में हो ,उन्हें यदि गुरु देख रहा हो तो  अशुभ  प्रभाव समाप्त हो जाता है |

  (२३)  -  जिसकी कुण्डली में लग्न या चन्द्रमा से सातवे स्थान में शुभग्रह या सप्तमेश होता है उसकी सन्तानहीन वैधव्यता तथा विषांगनाजन्य दोष का नाश हो जाता है |

                                  लग्नाद विधोर्वा यदि जन्मकाले शुभग्रहो वा मदनाधिपच्श |      

                                   द्द्युनस्थितो हन्त्यनपत्यदोषं वैधव्यदोषं च विशाङ्नाख्यं ||

  (२४)  - जातक कि कुण्डली मे यदि केन्द्र ,त्रिकोण मे शुभग्रह हो तथा 3,6,11,मे पापग्रह हो तथा सप्तम मे  सप्तमेश हो तो मंगली दोष का अभाव होता है |

                        यथा -  केन्द्रे कोणे   तदा भौमस्य दोषो न मदने मदपस्तथा ||

  (२५)   -  जिस मेलापक  में भौम के तुल्य भौम या उसी प्रकार का पापग्रह होता है तो विवाह शुभफलदाता  होता  है तथा वर कन्या दीर्घायु ,पुत्र पौत्रादि से सम्पन होते है |

                         यथा –  भौम तुल्यः यदा भौमः पापो वा ताद्रिशो भवेत् |

                                    विवाहः     शुभदः    प्रोक्तच्षिरायुः  पुत्रपौत्रदः ||   

कुण्डली व्दारा भविष्य का ज्ञान कैसे सम्भव है ?

हम सभी जानतें है की सभी गृह सूर्य की परिक्रमा करतें है , चन्द्रमा पृथ्वी का चक्कर काटता है और पृथ्वी सूर्य का पृथ्वी के अलावा मंगल , बुद्ध , ब्रहस्पति , शुक्र और शनि , ये पांचो गृह भी सूर्य के चारो ओर अपनी - अपनी अंडाकार कक्षाओं में भ्रमण करतें इस कारण इनकी पृथ्वी से दूरी घटती बढ़ती रहती हैं जिनका प्रभाव पृथ्वी और पृथ्वी पर रहने वालो पड़ता है इसलिए ज्योतिष शास्त्र इन ग्रहों के प्रभाव के फलित का कथन करता है इस प्रकार उपरोक्त ग्रहों के साथ यदि सूर्य और चन्द्र को मिलायें तो ग्रहों की 7 संख्या हो जाती है  ज्योतिष में राहू और केतु को भी ग्रहों के रूप में स्वीकार किया गया हैं खगोल की दृष्टि से इन ग्रहों का आकाश मण्डल में कोई प्रत्यक्ष आस्तित्व नहीं है इसलिए ज्योतिष में इन्हें छाया ग्रह कहा गया हैं |इन्हें अंग्रेजी में '' नार्थ नोड ऑफ़ द मून '' और '' साऊथ नोड ऑफ़ द मून ''कहा जाता हैं | इसी माध्यम से ग्रहों की दृष्टि के कारण पृथ्वी पर रहने वाले बुद्धिजीवी मनुष्यों पर जो प्रभाव पड़ता है उसी के ज्ञान को कुण्डली विज्ञान कहते हैं

भाग्य क्या है ?

                                              वास्तव में भाग्य की शुद्ध परिभाषा है -'' पूर्व जन्मों के पुण्य कर्मों का उदय ही भाग्य है ''और पूर्व जन्मों के बुरे कार्यों को प्रारब्ध कहतें है | जिन्हें हम कर्म्बद्ध के रूप में उन्ही शेष कर्मों को व्यतीत करने एवं और कर्मों को करने के लिए जन्म लेते हैं | ज्योतिष के द्वारा ये भी ज्ञात हो जाता है की मरने वाला अब जन्म कहाँ लेगा सिर्फ उसके मरने के समय जो नक्षत्र चल रहा हो इसका ज्ञान करके |

                                                                                                मुख्यतः हमने पूर्व जन्म में कर्म कियें हैं वाही भाग्य या प्रारब्ध सामने आता है | हमारा जैसा कर्म रहता है उसी के अनुसार जब ग्रह गोचर में होतें है तभी हमारा जन्म होता है |

अंक ज्योतिष क्या है ?

स्वर विज्ञान क्या है ?

                                भविष्य ज्ञान के लिए फलित ज्योतिष में अनेक विधाएं प्रचलित हैं जिसमें सटिक फलादेश के लिए स्वर भी अनादी काल से सर्वमान्य हैं | ज्योतिष की इस शाखा में उल्लेख भारतीय धर्मग्रंथो  में मिलता है वाल्मीकीय रामायण , महाभारत , योगवशिष्ठ , श्रीमदभागवत  , अग्निपुराण , विष्णुधर्मोत्तरपुराण ,शिवस्वरोदय , हठ योग प्रदीप , घेरण्ड सहिंता , नरपति जयचर्या , समरसार , यामलग्रंथ में तथा अन्य स्वर  एवं योग के ग्रंथो में ज्योतिषशास्त्र की इस विधा का प्रयाप्त वर्णन मिलता है |

कतिपय आचार्यों के मत से इडा चन्द्र नाड़ी तथा पिंगला सूर्य नाड़ी है बायीं नासिका को इडा तथा दाहिने को पिंगला मानतें हैं | एक अहोरात्र अर्थात 24 घंटे में प्रत्येक स्वस्थ ब्यक्ति के कुल 21 हजार 600 स्वांस चलती हैं मुख्यत नाड़ी 3 हैं -  इंडा , पिंगला , सुषुम्ना | इडा नाड़ी को सूर्य नाड़ी कहते हैं पिन्गला कको चन्द्र नाड़ी तथा सुषुम्ना को राहू नाड़ी अथवा शम्भू नाड़ी कहा जाता है | प्रत्येक व्यक्ति की नाशिक में दो छिद्र होतें है | वाम स्वर का उदय प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा , द्विताया , तृतीया , सप्तमी , अष्टमी ,तथा त्रयोदशी  , चतुर्दशी  एव्  पूर्णिमा तिथि में सूर्योदय समय से होता है और कृष्ण पक्ष में चतुर्थी , पञ्चमीं , षष्ठि ,  दशमी , एकादशी , द्वादशी तिथि में सुर्योदय समय में वाया स्वर चलता हैं  प्रत्येक स्वर एक घण्टा चलता है | इस 1 घण्टे में 20 मिनट पृथ्वी तत्व , 16 मिनट जल , 12 मिनट जल , 8 मिनट वायु तथा 4 मिनट आकाश तत्व रहता है |

 

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